भीख के पैसों से भर रहे घाव: भदोही की नई कुष्ठ बस्ती में बदहाल जिंदगी
विकास मिश्रा, ज्ञानपुर (भदोही)।
सरकार की योजनाओं और दावों के बावजूद जनपद में कुष्ठ रोगियों की हालत दयनीय बनी हुई है। दिव्यांग मरीजों को हर महीने 3000 रुपये पेंशन मिलती है, लेकिन अन्य रोगियों को जीवन यापन और घाव की मरहम-पट्टी के लिए भीख का सहारा लेना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि मरीज भीख में मिले पैसों से दवा और पट्टी खरीदकर अपने जख्म भरने की कोशिश करते हैं।
पांच साल में 383 मरीज मिले, 166 दिव्यांग वर्तमान में
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 से 31 दिसंबर 2025 तक जिले में कुल 383 कुष्ठ रोगी चिन्हित किए गए। इनमें से 199 मरीज स्वस्थ हो चुके हैं, जबकि वर्तमान में 166 दिव्यांग कुष्ठ रोगी हैं, जिन्हें पेंशन दी जा रही है।
पिपरिस की नई कुष्ठ बस्ती की हकीकत
सोमवार को टीम ने भदोही ब्लॉक के पिपरिस स्थित नई कुष्ठ बस्ती का दौरा किया। यहां करीब 40 सदस्य रह रहे हैं। बस्ती की हालत बेहद खराब है।
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1999 में बने इंदिरा आवास जर्जर हो चुके हैं।
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चार हैंडपंप में से दो खराब, एक से बालू युक्त दूषित पानी निकलता है।
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सामुदायिक भवन पर ताला लटका रहता है।
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सोलर लाइट शो-पीस बन चुकी है।
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परिसर में गंदगी और दुर्गंध का अंबार है।
सूर्यास्त के बाद पूरी बस्ती अंधेरे में डूब जाती है। साफ-सफाई और बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है।
बीमारी के कारण छोड़ना पड़ा गांव
बिजली मंडल (60), मूल निवासी बिहार, 50 साल पहले गांव छोड़कर यहां आ बसे। कृष्ण प्रसाद (50), झारखंड से 40 साल पहले आए। दोनों ने बताया कि गांव में लोग उन्हें हीन दृष्टि से देखते थे, इसलिए वापस जाना बंद कर दिया। काम नहीं मिला तो भीख मांगकर जीवन यापन कर रहे हैं।
पिंटू पासवान और रविदास ने बताया कि वे 20 वर्षों से यहां रह रहे हैं। बीमारी के कारण परिवार के सदस्यों की मौत भी हो चुकी है।
मरीजों की जुबानी पीड़ा
बिजली मंडल कहते हैं, “दोनों पैर से दिव्यांग हूं। 35 किलो राशन और 3000 रुपये पेंशन मिलती है, लेकिन गुजारा नहीं होता। भीख मांगनी पड़ती है। बस्ती में गंदगी है, स्वास्थ्य टीम कभी-कभार आती है।”
कृष्ण प्रसाद बताते हैं, “मरहम-पट्टी खुद के पैसों से करानी पड़ती है। योजना का लाभ नहीं मिलता। जंघई और प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन पर भीख मांगकर गुजर-बसर करते हैं।”
साल में दो बार ही लगता है कैंप
स्वास्थ्य विभाग की टीम 30 जनवरी और 2 अक्टूबर को विशेष कैंप लगाकर दवा वितरण करती है। हालांकि स्थानीय लोगों का आरोप है कि नियमित निगरानी नहीं होती।
इस मामले में सीएमओ डॉ. एसके चक का कहना है कि कुष्ठ रोगियों को समय-समय पर दवा, मलहम और चप्पल उपलब्ध कराई जाती है तथा स्वास्थ्यकर्मी हर 15 दिन में बस्ती का दौरा करते हैं।
पांच साल का आंकड़ा
| वर्ष | नए मरीज | स्वस्थ हुए |
|---|---|---|
| 2021-22 | 76 | 76 |
| 2022-23 | 96 | 83 |
| 2023-24 | 70 | 88 |
| 2024-25 | 88 | 70 |
| 2025-26 | 56 | 55 |
सवालों के घेरे में व्यवस्थाएं
नई कुष्ठ बस्ती की जमीनी हकीकत कई सवाल खड़े करती है—क्या पेंशन और राशन से ही जीवन संभव है? क्या नियमित स्वास्थ्य सेवाएं और स्वच्छता सुनिश्चित की जा रही हैं?
कुष्ठ उन्मूलन के दावों के बीच पिपरिस की यह बस्ती आज भी उपेक्षा और अभाव की मार झेल रही है।
Author: Ashu Jha : Bharat Kranti News
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