रहमतों, बरकतों और मगफिरत का महीना है माह-ए-रमजान : मो. फैसल
भदोही। इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना माह-ए-रमजान रहमतों, बरकतों और मगफिरत (माफी) का महीना माना जाता है। इसी मुकद्दस महीने में मुसलमानों की धार्मिक किताब कुरान शरीफ नाजिल हुई थी। इस्लाम धर्म के पांच बुनियादी स्तंभ—तौहीद, नमाज, रोजा, हज और जकात—का महत्व इस महीने में और बढ़ जाता है।
नगर की विभिन्न मस्जिदों में इन दिनों पेश इमाम अपने तकरीरों में रमजान की फजीलत बयान कर रहे हैं। मुसलमानों पर पांच वक्त की नमाज पढ़ना फर्ज बताया गया है, जबकि रमजान में ईशा की नमाज के बाद तरावीह पढ़ना सुन्नत है। रोजा रखना हर बालिग और सेहतमंद मुसलमान के लिए जरूरी करार दिया गया है, जबकि बीमार, मुसाफिर और विशेष परिस्थितियों वाले लोगों को शरीयत में छूट दी गई है।
रोजा इफ्तार सामूहिक रूप से करने की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। पूरे महीने कुरआन पढ़ने और सुनने की हिदायत दी गई है, जिसे तरावीह के दौरान मस्जिदों में मुकम्मल किया जाता है। शहर की मस्जिदों में रोजाना बड़ी संख्या में लोग नमाज और तरावीह में शिरकत कर रहे हैं, जिससे पूरी फिजा इबादत के रंग में रंगी नजर आ रही है।
भदोही नगर के मर्यादपट्टी स्थित मदरसा शमसिया तेगिया के प्रधानाचार्य मो. फैसल अशर्फी ने बताया कि इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ल. ने रमजान को रहमतों, बरकतों और मगफिरत का महीना बताया है। उन्होंने कहा कि रमजान सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने अंदर सब्र, परहेजगारी, इंसानियत और दूसरों के प्रति हमदर्दी पैदा करने का महीना है।
उन्होंने कहा कि इस्लाम सामाजिक समरसता और भाईचारे का संदेश देता है। समाज के निर्धनों, असहायों, यतीमों और जरूरतमंदों की मदद करने पर विशेष जोर दिया गया है, जो जकात और सदका के रूप में अदा की जाती है। रमजान में लोग बढ़-चढ़कर जरूरतमंदों की मदद करते हैं ताकि हर घर में ईद की खुशियां पहुंच सकें।
मौलाना ने हदीस का हवाला देते हुए कहा, “तुम जमीन वालों पर रहम करो, आसमान वाला तुम पर रहम फरमाएगा।” उन्होंने कहा कि नबी सल्ल. का फरमान है कि जो लोग दूसरों पर रहम नहीं करते, उन पर अल्लाह भी रहम नहीं करता। हर बड़े को छोटों पर रहम और हर ताकतवर को कमजोर का सहारा बनना चाहिए। यही रमजान का असली पैगाम है।
Author: Ashu Jha : Bharat Kranti News
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