पीएम आदर्श गांव योजना की हकीकत: करोड़ों खर्च, फिर भी बदहाल गांव
ज्ञानपुर।
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी पीएम आदर्श गांव योजना जिले में भ्रष्टाचार, लापरवाही और निगरानी के अभाव की भेंट चढ़ती दिख रही है। अनुसूचित जाति बहुल गांवों को बुनियादी सुविधाओं से जोड़ने के लिए शुरू की गई यह योजना अब ग्रामीणों के लिए मजाक बनकर रह गई है।
गांवों में जगह-जगह टूटी नालियां, उखड़ी इंटरलॉकिंग, बंद पड़े हैंडपंप, खराब सोलर लाइटें और गंदगी से पटे शौचालय योजना की पोल खोल रहे हैं। बरसात के मौसम में हालात और बदतर हो जाते हैं। सड़कों पर जलभराव से आवागमन मुश्किल हो जाता है।
ग्रामीणों में आक्रोश, बोले—शिकायत का कोई असर नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार ग्राम प्रधान, ब्लॉक और जिला स्तर पर शिकायत की गई, लेकिन सिर्फ आश्वासन ही मिला। शिवरामपुर के एक ग्रामीण ने बताया कि,
“नाली टूटने से घरों का पानी सड़क पर बहता है, मच्छर पनप रहे हैं। अधिकारी आए, फोटो खिंचवाई और चले गए।”
बनकट छनौरा में ग्रामीणों ने बताया कि हैंडपंप खराब होने से पीने के पानी की समस्या बनी हुई है। मजबूरी में लोगों को दूर-दराज के निजी हैंडपंप या तालाब का सहारा लेना पड़ रहा है।
गुणवत्ता पर उठे सवाल
योजना के तहत कराए गए कार्यों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि घटिया सामग्री का प्रयोग किया गया, जिससे महज दो-तीन साल में ही निर्माण कार्य टूटने लगे। सोलर लाइटें लगते ही खराब हो गईं, जिनकी मरम्मत आज तक नहीं कराई गई।
निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल
समाज कल्याण निगम और कार्यदायी संस्था सिडको द्वारा कराए गए कार्यों की नियमित मॉनिटरिंग नहीं हुई, जिसका खामियाजा गांवों को भुगतना पड़ रहा है। न तो समय-समय पर निरीक्षण हुआ और न ही दोषियों पर कोई कार्रवाई।
जांच की उठी मांग
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने पूरी योजना की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो भविष्य में भी सरकारी योजनाएं इसी तरह दम तोड़ती रहेंगी।
अब सवाल यह है कि 21.60 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद यदि गांव आदर्श नहीं बन सके, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या दोषी अफसरों और कार्यदायी संस्था पर कार्रवाई होगी या फिर यह योजना भी फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगी?
Author: Ashu Jha : Bharat Kranti News
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