🕰️ 1950 से 2025 तक: उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण की वह दास्तां, जो बार-बार हिलाती रही समाज को
धर्मांतरण का मुद्दा केवल वर्तमान का संकट नहीं है, बल्कि इसके इतिहास की जड़ें आज़ादी के बाद के शुरुआती वर्षों से ही उत्तर प्रदेश में फैली हुई हैं। आगरा और मथुरा जैसे ऐतिहासिक शहरों से निकले कुछ प्रमुख मामलों ने न सिर्फ स्थानीय समाज को बल्कि राज्य की राजनीति को भी बार-बार झकझोरा।
🔍 1954: मथुरा में बड़ा खुलासा – जब सरकार को देना पड़ा था जवाब
आज़ादी के कुछ ही वर्षों बाद, उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के मामले सामने आने लगे थे।
10 अप्रैल 1954 को ‘अमर उजाला’ में छपी खबर ने सनसनी फैला दी। रिपोर्ट के मुताबिक, मथुरा में करीब 250 लोगों ने एक साथ धर्म परिवर्तन कर लिया था।
यह संख्या सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज की गई, लेकिन उस समय के पत्रकार और स्थानीय लोगों के अनुसार वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा थी।
मामला जब विधानसभा में पहुँचा, तो तत्कालीन गृहमंत्री संपूर्णानंद को खुद सफाई देनी पड़ी।
इसके बाद केंद्र सरकार ने यह साफ कर दिया कि अब इस तरह से समूह में धर्मांतरण की अनुमति नहीं दी जाएगी।
यह घटना अपने समय में इतनी बड़ी थी कि मथुरा के साधु-संत, समाजसेवी संगठनों और नागरिक मंचों ने इसे लेकर लंबा आंदोलन चलाया। पहली बार उत्तर भारत में धर्मांतरण के मुद्दे ने राजनीतिक रंग लेना शुरू किया।
🕌 1993: आगरा के वाल्मीकि समाज में खलबली – बृज मोहन का धर्म परिवर्तन
आगरा के सदर क्षेत्र में रहने वाले वाल्मीकि समाज के बृज मोहन का मामला 13 मार्च 1993 को ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित हुआ और फिर राष्ट्रीय स्तर की बहस बन गया।
बृज मोहन ने अपना नाम बदलकर दीन मोहम्मद रख लिया। यह केवल व्यक्तिगत मामला नहीं था – बृज मोहन के साथ उनकी पत्नी और बेटी इंदिरा ने भी इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था।
माना जाता है कि इस पूरे घटनाक्रम में आगरा के प्रसिद्ध मुफ्ती अब्दुल कद्दूस रूमी की अहम भूमिका थी, जिन्होंने धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया कराई।
हालांकि, यह मामला दो साल तक पूरी तरह छुपा रहा। जैसे ही इसका खुलासा हुआ, वाल्मीकि समाज में जबरदस्त आक्रोश फैल गया।
आगरा की सड़कों पर एक महीने से ज्यादा समय तक प्रदर्शन, जुलूस और धरने हुए। वाल्मीकि समाज ने इसे अपने अस्तित्व से जुड़ा सवाल बताया और मीडिया में लगातार यह बहस होती रही कि क्या यह धर्मांतरण स्वेच्छा से हुआ या दबाव में।
📚 2000: सेंट जोंस कॉलेज की छात्रा की दास्तां – आत्महत्या की कोशिश तक पहुँची
12 अप्रैल 2000 को फिर एक बार अमर उजाला की रिपोर्ट ने शहर को झकझोर दिया।
आगरा के प्रतिष्ठित सेंट जोंस कॉलेज की छात्रा सरिता ने आरोप लगाया कि कॉलेज प्रबंधन उस पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव डाल रहा था।
दबाव इतना बढ़ा कि सरिता ने आत्महत्या की कोशिश की।
मामला तुरंत राजनीतिक रंग में रंगा। भाजपा के नेताओं और छात्र संगठनों ने कॉलेज प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कॉलेज गेट पर लगातार धरना-प्रदर्शन हुए और कई दिनों तक शहर की सुर्खियों में सिर्फ यही मुद्दा छाया रहा।
इस घटना ने साबित किया कि धर्मांतरण के प्रयास सिर्फ गरीब और पिछड़े वर्गों तक सीमित नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे तबके तक पहुँच चुके हैं।
🧩 हालिया मामले: संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश
धर्मांतरण की यह प्रक्रिया 1950, 1990 या 2000 तक सीमित नहीं रही।
हाल ही में फिर से आगरा के सदर क्षेत्र में कारोबारी की दो बेटियों के अवैध धर्मांतरण का मामला सामने आया।
साथ ही बलरामपुर में जलालुद्दीन उर्फ छांगुर के खिलाफ हो रही कार्रवाई से यह भी खुलासा हुआ कि किस तरह विदेशी फंडिंग और संगठित नेटवर्क के ज़रिए सुनियोजित तरीके से धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था।
🧭 समाज और राजनीति पर असर: क्यों बार-बार उठता है धर्मांतरण का मुद्दा?
इतिहास में हर बार यह सवाल खड़ा हुआ – क्या यह धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से था या किसी लालच, दबाव या साजिश का नतीजा?
1954 में जब सरकार को विधानसभा में जवाब देना पड़ा, तब भी यही सवाल था।
1993 में वाल्मीकि समाज के आंदोलन के दौरान भी यही बहस उठी।
2000 में जब एक छात्रा आत्महत्या की कोशिश तक पहुँच गई, तब भी पूरे समाज ने यह प्रश्न पूछा।
हर बार कुछ समय के लिए यह बहस तेज़ होती, आंदोलन होते, लेकिन फिर मामला शांत हो जाता। लेकिन हाल के खुलासों से एक बार फिर यह सवाल गहराया है कि क्या देश में अभी भी धर्मांतरण की जड़ें उतनी ही गहरी हैं?
📝 निष्कर्ष: सबक और ज़िम्मेदारी
1950 से लेकर आज तक धर्मांतरण के इन मामलों ने यह दिखाया कि सिर्फ कानून बनाना काफी नहीं है। समाज को भी सतर्क रहना होगा, शिक्षा संस्थानों और धार्मिक संगठनों की पारदर्शिता ज़रूरी है।
धर्म व्यक्ति का निजी अधिकार है, लेकिन जब धर्मांतरण किसी दबाव, डर या लालच का नतीजा हो, तो यह केवल एक अपराध ही नहीं – बल्कि पूरे समाज के लिए ख़तरा बन जाता है।
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Author: Bharat Kranti News
Anil Mishra CEO & Founder, Bharat Kranti News Anil Mishra is the CEO and Founder of Bharat Kranti News, a platform dedicated to fearless and unbiased journalism. With a mission to highlight grassroots issues and promote truth in media, he has built Bharat Kranti News into a trusted source of authentic and people-centric reporting across India.


