भदोही में कुपोषण पर स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती उजागर, 5677 बच्चों में सिर्फ 74 पहुंचे एनआरसी
भदोही जिले में कुपोषण उन्मूलन को लेकर सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। जिले में जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच 5677 बच्चे कुपोषित और अति कुपोषित पाए गए, लेकिन इनमें से केवल 74 बच्चों को ही जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) तक पहुंचाया जा सका। आंकड़ों के अनुसार गंभीर स्थिति वाले बच्चों में मात्र डेढ़ फीसदी को ही विशेष उपचार मिल पाया।
जिले में संचालित 1496 आंगनबाड़ी केंद्रों पर 1.25 लाख से अधिक बच्चे पंजीकृत हैं। यहां हर महीने शून्य से छह वर्ष तक के बच्चों का वजन और लंबाई मापकर उनकी पोषण स्थिति का आकलन किया जाता है। इसी आधार पर बच्चों को अति कुपोषित (SAM) और कुपोषित (MAM) श्रेणी में रखा जाता है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2026 में 69 बच्चे अति कुपोषित और 437 बच्चे सामान्य कुपोषण की श्रेणी में पाए गए। वहीं जनवरी से अप्रैल तक कुल 870 बच्चे अति कुपोषित और 4807 बच्चे कुपोषित दर्ज किए गए। इतनी बड़ी संख्या सामने आने के बावजूद एनआरसी में बच्चों की उपस्थिति बेहद कम रही।
10 बेड का केंद्र, लेकिन आधे भी नहीं भर रहे
सोमवार को जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र की पड़ताल में 10 बेड वाले केंद्र में केवल छह बच्चे भर्ती मिले। अधिकारियों के अनुसार कई महीनों तक यहां सिर्फ तीन से पांच बच्चे ही भर्ती रहते हैं। जबकि एनआरसी विशेष रूप से गंभीर कुपोषित बच्चों के इलाज, पौष्टिक आहार और चिकित्सकीय निगरानी के लिए बनाया गया है, जहां बच्चों को 14 दिनों तक भर्ती रखकर उपचार किया जाता है।
गांवों तक सीमित रह जा रहे कुपोषित बच्चे
जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी समस्या रेफरल और जागरूकता की बताई जा रही है। आंगनबाड़ी और एएनएम स्तर पर बच्चों की पहचान तो हो रही है, लेकिन उन्हें समय पर एनआरसी भेजने की प्रक्रिया बेहद धीमी है। बड़ी संख्या में अति कुपोषित बच्चे गांवों और घरों तक ही सीमित रह जाते हैं।
मई महीने में एनआरसी पहुंचे बच्चों में केवल सुरियावां ब्लॉक के बच्चे शामिल थे। डीघ, औराई, ज्ञानपुर, भदोही और अभोली ब्लॉक से एक भी बच्चा पुनर्वास केंद्र तक नहीं पहुंचा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सक्रियता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अभिभावकों की अनिच्छा भी बड़ी वजह
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई अभिभावक बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराने के लिए तैयार नहीं होते। परिवार अक्सर यह मान लेते हैं कि बच्चा घरेलू खानपान से ठीक हो जाएगा। वहीं कुछ लोग अस्पताल में लंबे समय तक रुकने से भी बचते हैं।
स्वास्थ्य प्रक्रिया के तहत जब कोई बच्चा कुपोषित मिलता है तो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उसे टीकाकरण दिवस पर एएनएम को दिखाती हैं। यदि एएनएम को लगता है कि सामान्य दवा, पोषण और साफ-सफाई से सुधार संभव है तो समुदाय स्तर पर निगरानी की जाती है। लेकिन हालत गंभीर होने पर डॉक्टर के माध्यम से एनआरसी रेफर किया जाता है।
एनआरसी में मिलती हैं ये सुविधाएं
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती बच्चों को पौष्टिक भोजन, नाश्ता, दवाएं और नियमित चिकित्सकीय निगरानी दी जाती है। बच्चों की माताओं को भी आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
- मां को प्रतिदिन 100 रुपये की सहायता
- दोनों समय भोजन और नाश्ते की व्यवस्था
- 14 दिन पूरे होने पर 700 रुपये बैंक खाते में ट्रांसफर
- हर फॉलोअप विजिट पर 100 रुपये यात्रा भत्ता
इसके बावजूद लोगों की कम भागीदारी स्वास्थ्य विभाग के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
अधिकारियों का दावा
डीपीओ दिनेश मिश्रा ने कहा कि लगातार निगरानी और मॉनीटरिंग से जिले में कुपोषण की स्थिति पहले से काफी बेहतर हुई है। उनके अनुसार एक दशक पहले जिले में 30 से 35 हजार तक कुपोषित बच्चे मिलते थे, जबकि अब संख्या में काफी कमी आई है।
वहीं सीएमओ डॉ. संतोष कुमार चक ने कहा कि पोषण पुनर्वास केंद्र में आने वाले प्रत्येक बच्चे का गंभीरता से इलाज किया जाता है, ताकि उन्हें जल्द सामान्य श्रेणी में लाया जा सके।
Author: Ashu Jha : Bharat Kranti News
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