भदोही/नई दिल्ली। भारतीय हस्तनिर्मित कालीनों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग पहचान दिलाने और उनकी प्रामाणिकता को मजबूत करने की दिशा में कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) ने बड़ा कदम उठाया है। परिषद ने भारतीय कालीनों के लिए विशेष कालीन लेबल के डिजाइन को मंजूरी दे दी है। लेबल की छपाई का कार्य शुरू हो चुका है और जल्द ही इसे ट्रायल के तौर पर कालीनों पर लगाया जाएगा।
हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित सीईपीसी बोर्ड की बैठक में इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में तय किया गया कि छपाई पूरी होने के बाद इसे पहले सीमित स्तर पर कुछ निर्यातकों के माध्यम से ट्रायल के रूप में लागू किया जाएगा। ट्रायल के दौरान इसके प्रभाव, उपयोगिता और बाजार की प्रतिक्रिया का आकलन किया जाएगा।
भारत का कालीन उद्योग विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान रखता है। भारतीय हस्तनिर्मित कालीन अपनी बारीक बुनाई, डिजाइन और गुणवत्ता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी लोकप्रिय हैं। वर्तमान में भारत से कालीनों का निर्यात विश्व के करीब 65 देशों में किया जाता है। इनमें अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और मध्य पूर्व के कई देश प्रमुख हैं। ऐसे में यह नया लेबल भारतीय कालीनों की ब्रांडिंग, विश्वसनीयता और पहचान को और मजबूत करेगा।
लेबल के माध्यम से मिलेगी पूरी जानकारी
अक्सर विदेशी बाजारों में खरीदारों और आयातकों के मन में यह जिज्ञासा रहती है कि भारतीय कालीन किस प्रकार बनाए जाते हैं, उनमें किस तरह की कारीगरी होती है और किन क्षेत्रों में उनका निर्माण होता है। सीईपीसी का यह नया लेबल इन सभी सवालों का जवाब देगा।
लेबल पर एक विशेष क्यूआर कोड लगाया जाएगा। इसे मोबाइल से स्कैन करने पर लगभग 5 मिनट 40 सेकंड की वीडियो दिखाई देगी, जिसमें कालीन निर्माण की पूरी प्रक्रिया को दर्शाया जाएगा। वीडियो के माध्यम से यह बताया जाएगा कि धागा कैसे तैयार होता है, रंगाई और धुलाई की प्रक्रिया कैसे होती है, कालीन की बुनाई कैसे की जाती है और अंतिम रूप देने में किन-किन चरणों से गुजरना पड़ता है।
इसके साथ ही वीडियो में भारत के उन प्रमुख क्षेत्रों की जानकारी भी दी जाएगी, जहां कालीन उद्योग विकसित है। साथ ही कमेंट्री के जरिए भारतीय कालीनों के इतिहास और परंपरा को भी दर्शाया जाएगा, जिससे विदेशी खरीदारों को भारतीय कारीगरों की मेहनत और कला की बेहतर समझ मिल सकेगी।
निर्यातकों को किया जाएगा प्रेरित
सीईपीसी के पदाधिकारियों का कहना है कि कालीन लेबल लगाना निर्यातकों के लिए अनिवार्य नहीं होगा, लेकिन उन्हें इसके उपयोग के लिए प्रेरित किया जाएगा। परिषद का मानना है कि इससे विदेशी खरीदारों और खुदरा उपभोक्ताओं के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी बनेगा, जिससे भारतीय कालीनों की मांग बढ़ सकती है।
सीईपीसी के उपाध्यक्ष असलम महबूब ने बताया कि लेबल का ट्रायल जल्द ही शुरू किया जाएगा। शुरुआत में कुछ निर्यातकों के माध्यम से इसे लागू किया जाएगा और उसके परिणामों का अध्ययन किया जाएगा।
एकमा के मानद सचिव पीयूष बरनवाल का कहना है कि यदि व्यक्तिगत रूप से देखा जाए तो यह लेबल भारतीय कालीनों के लिए काफी उपयोगी साबित होगा। इससे न केवल कालीन के भारतीय होने का प्रमाण मिलेगा, बल्कि इसके पीछे छिपी परंपरा और इतिहास भी दुनिया के सामने आएगा।
वहीं सीईपीसी के प्रशासनिक सदस्य इम्तीयाज अहमद ने कहा कि परिषद ने इस लेबल को तैयार करने में काफी विचार-विमर्श किया है। ट्रायल के दौरान इसके फायदे और कमियों का आकलन किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर इसमें सुधार भी किया जाएगा।
उद्योग को मिल सकती है नई पहचान
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह पहल सफल रही तो भारतीय कालीन उद्योग को वैश्विक बाजार में नई पहचान मिल सकती है। इससे न केवल निर्यात को बढ़ावा मिलेगा बल्कि भारतीय कारीगरों की कला और परंपरा भी विश्व स्तर पर और अधिक पहचान हासिल कर सकेगी।
भदोही, मिर्जापुर और वाराणसी जैसे क्षेत्रों में हजारों परिवार कालीन उद्योग से जुड़े हुए हैं। ऐसे में यह पहल कारीगरों और निर्यातकों दोनों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।
Author: Ashu Jha : Bharat Kranti News
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