गांव से लुप्त होती कजली और जरई की परंपरा, अब सिर्फ यादों में बची मधुर तानें

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

आखिर क्यों विलुप्त हो रही है गांव से कजली और जरई की परंपरा

भदोही।
कभी सावन-भादो के महीनों में गांव की गलियों में गूंजने वाली कजली की मधुर तानें आज सन्नाटे में दबकर रह गई हैं। उत्तर भारत, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के सीमावर्ती इलाकों में पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा अब सिर्फ बुजुर्गों की यादों में सिमट गई है।

बचपन की यादों में अब भी ताजा है वह दृश्य, जब गांव के बाहर फैले हरे-भरे बगीचों में महिलाएं और युवतियां दो गुटों में बंटकर, एक-दूसरे का हाथ थाम झूमते हुए कजली गाती थीं। गीतों के इस आदान-प्रदान के बाद महिलाएं तालाब के किनारे “जरई माता” का विसर्जन करतीं, स्नान कर सामूहिक भोजन करतीं और फिर दोबारा गीत-संगीत की महफ़िल जमातीं।


50-60 साल पहले का कजली महोत्सव

उस दौर में कजली के दिन बहनें और महिलाएं भाई के कान पर “जरई” — पीतल, चांदी या सोने की एक छोटी कटोरी — रखकर आशीर्वाद देती थीं। इसके साथ लोकगीतों की लय और भावनाओं की मिठास पूरे माहौल में घुल जाती थी। यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि परिवार और समाज में प्रेम, अपनापन और शुभकामनाओं का आदान-प्रदान था।


जरई का अर्थ और महत्व

भारतीय संस्कृति में कान को ज्ञान और स्मृति का द्वार माना गया है। जरई का कान पर स्पर्श इस बात का प्रतीक था कि बहन का आशीर्वाद और गीत सीधे भाई के मन और आत्मा तक पहुंचे।
सोना, चांदी और पीतल जैसी धातुएं शुभता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थीं। इस रस्म में तीन अद्भुत तत्व होते थे — गीत, स्पर्श और शुभकामना — जो मिलकर रिश्तों में गहरा भावनात्मक जुड़ाव पैदा करते थे।


क्यों घट रही है यह परंपरा

स्थानीय बुजुर्गों और लोक-संस्कृति जानकारों के मुताबिक, कई कारण इस परंपरा के लुप्त होने के पीछे जिम्मेदार हैं:

  • शहरीकरण और पलायन: गांव से रोजगार और पढ़ाई के लिए शहरों में जाने वालों की संख्या बढ़ गई है।

  • आधुनिक मनोरंजन का प्रभाव: टीवी, मोबाइल और इंटरनेट ने लोकगीतों की जगह ले ली है।

  • समय और धैर्य की कमी: पहले सावन-भादो में कृषि कार्य का दबाव कम होता था, जिससे महिलाएं समय निकाल पाती थीं, लेकिन अब यह संभव नहीं।

  • नई पीढ़ी की रुचि में बदलाव: पारंपरिक गीत और रस्में अब युवाओं के लिए अपरिचित होती जा रही हैं।


सांस्कृतिक क्षति

कजली केवल एक गीत नहीं, बल्कि यह सामाजिक मेल-जोल, सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक थी। जरई रखने का वह पल भाई के मन में जीवनभर के लिए अंकित हो जाता था।
इस परंपरा के समाप्त होने से एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर खो रही है — और इसके साथ ही गांव का सामूहिक उत्सव और रिश्तों की गर्माहट भी कम हो रही है।


संरक्षण के उपाय

सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर इस परंपरा को बचाना है तो तत्काल कदम उठाने होंगे:

  1. लोकगीत महोत्सव का आयोजन: गांव और शहर दोनों में सावन-भादो के दौरान कजली प्रतियोगिताएं कराई जाएं।

  2. स्कूल-कॉलेज में लोकसंगीत शिक्षा: नई पीढ़ी को लोकगीत और रस्मों से जोड़ने के लिए पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।

  3. सोशल मीडिया पर प्रचार: कजली और जरई के गीतों की रिकॉर्डिंग साझा कर इन्हें डिजिटल पहचान दी जाए।

  4. गांव में सांस्कृतिक मंच: जहां लोग साल में एक बार पारंपरिक पोशाक और वाद्य यंत्रों के साथ इस त्यौहार को पुनर्जीवित कर सकें।


अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में कजली और जरई की मधुर तानें सिर्फ किताबों, फोटो एलबम और बुजुर्गों की कहानियों तक सीमित रह जाएंगी।

ब्यूरो रिपोर्ट — पवन उपाध्याय
भारत क्रांति न्यूज़

Bharat Kranti News
Author: Bharat Kranti News

Anil Mishra CEO & Founder, Bharat Kranti News Anil Mishra is the CEO and Founder of Bharat Kranti News, a platform dedicated to fearless and unbiased journalism. With a mission to highlight grassroots issues and promote truth in media, he has built Bharat Kranti News into a trusted source of authentic and people-centric reporting across India.

Leave a Comment

और पढ़ें

Read More Articles